Tuesday, January 13, 2015

Dug from the graveyard : KATJA PATANG

दुनिया के विशाल आस्मान मे पतंगों की तरह हम उड़ रहे हैं 
रस्मो रिवाज़ों, रिश्ते-नातों की डोर से बंधे हुए सब उड़ रहे हैं

बदन लहराते हुए यह पतंग, खुले हवा मे बह जाना चाहता है 
चहु और करवट बदल, अपने डोर से छूट पाने का बहाना ढूंढ़ता है

किसी और पतंग से पेंच लड़ाकर कट जाने की उम्मीद में हम सब उड़ रहे हैं 

Dug from the graveyard (archives) : KAVITHA KI IMARATH

कविता है वो इमारत, 
जिसकी सोच है बुनियाद और शब्द, दीवारें । 

जो सोच हो मज़बूत पर फीके हो दीवारें -
पत्थर का पहाड़ है,
टिकता है सालों साल, मगर छड़ता नही कोई बार बार । 

जो कम्ज़ोर है बुनियाद, पर शब्दों की है भूल भुलैय्या -
पत्तो का महल है,
देखते है सभी मूड मूड कर, मगर उजड़ जाता है जो अगले हवा के झोंके से । 

Thursday, December 25, 2014

A CUCKOO OF HOPE

A cuckoo of hope whispered somewhere,
A thousand birds took to flight.

To escape from their droughtful plight,
They reached for the sun shining bright

Nervous they fly wondering what might,
Together determined to find their new haven with might

In the distant light, blue green and grain they sight
With delight they alight, though their hearts take flight

Without realizing it's a bait, they take a sip and a bite
While cannons fire off and the net around them shuts tight

The big cuckoo of deceit is whistling with delight,
Laughing at their flapping wings in petty fight

Surrounded by unpecked fruits and piles full of water,
Through the bars of their cages, they woefully look at the flying kite.